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आज लिखने बैठा हूँfountain-pen-writing
अरसे बीते हैं
अब जब कलम
कोसों दूर है

सालों से जिन्होने
शब्दों की रोशनी नहीं देखी
अब उन पुरानी बातों पर से
दिमागी परतें
आज उतारने बैठा हूँ

कहते फ़िरते हैं
शौक पाला है हमने
लिखने का
आज खुद ही खुद को खुद से
खुदा से और इस खुदी से
उपर उठाने बैठा हूँ

इक अधजला कागज़ हूँ
या इक सूखी दवात
इक टूटी कलम
या खोया हुआ खलायात
तुम्हारे सवालों में उलझा हुआ
इक जवाब
या बेचैन नींदों में खोया हुआ
इक अनजाना ख्वाब…
आज मैं हर इल्ज़ाम
मिटाने बैठा हूँ

Time

Time! On whose arbitrary wing
The varying hours fly,
Whose tardy winter, fleeting spring,
Drag or drive us to die . . . ,

You! Who on my birth’s bestowed
Those boons to all that know you known,
Yet better I sustain your load,
For now I bear the load alone.

I could find just one heart to share
The bitter moments you have given,
And pardon you since you couldn’t spare
All that I loved to peace or heaven.

To than be joy or rest, on me
Your future ills shall press in vain,
I shall owe nothing but years to thee,
A debt already paid in pain. . . . . .

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