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आज लिखने बैठा हूँfountain-pen-writing
अरसे बीते हैं
अब जब कलम
कोसों दूर है

सालों से जिन्होने
शब्दों की रोशनी नहीं देखी
अब उन पुरानी बातों पर से
दिमागी परतें
आज उतारने बैठा हूँ

कहते फ़िरते हैं
शौक पाला है हमने
लिखने का
आज खुद ही खुद को खुद से
खुदा से और इस खुदी से
उपर उठाने बैठा हूँ

इक अधजला कागज़ हूँ
या इक सूखी दवात
इक टूटी कलम
या खोया हुआ खलायात
तुम्हारे सवालों में उलझा हुआ
इक जवाब
या बेचैन नींदों में खोया हुआ
इक अनजाना ख्वाब…
आज मैं हर इल्ज़ाम
मिटाने बैठा हूँ

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Will not stop loving

May be the day’s long gone

May be its long to be dawn

But who would

Sit at nights

Peeping the stars alone..??

I’m not definitely up giving,

Will not stop loving…

promise

promise

Words coming up at random

I’m now not afraid of outcome

When you with me

Life’s looking hazy

But calm

O please..!!

Stay with me…

For I may fall…

I don’t know you will

Hold back or not…

But at least…

I will again see myself standing…

I promise you sweetheart

Will not stop loving…

parted

parted

everyone writes on how a guy feels after two people get parted.

here I try to depict… how a girl really feels…

जाने अन्जाने शायद कुछ

कह ना पायी थी,

तुम भी तो

ना थे समझे,

और हर अनकहा शब्द

दर्द बन कर रह गया है

.

सिरहन सी दौड जाती है

जब पास से निकल जाते हो,
क्या कठोर ही थे

या मैं ना जानी थी,

और हर छिपाया आँसू

वहीं जम कर रह गया है

.

ना चाह कर भी सोचने

पर मज़बूर हुई थी,

कि हम साथ थे जब

तो क्या पैदा इक दूरी हुई थी,

और हम जहाँ हैं आज क्या

उसी का नतीजा हो कर रह गया है

.

दिन से सप्ताह

सप्ताह पक्ष हुए, और

पक्ष महीने हुए हैं

हमें नज़रें मिलाये,

बस दूर से ही

सुनती हूँ तुम्हें,

और यादों के काँच का हर टुकडा

खुद को सताने का ज़रिया हो गया है

.

मैं तुम्हारी तरह

अपनी मर्ज़ी से नहीं चलती,

हज़ारों तरह की उम्मीदों का

नन्हा सा बांध हूँ,

किस किस को थाम के चलूँ

इसी कश्मकश में,

सब कुछ पीछे

छूटता जाता है,

रिश्ते नहीं संभाल पा रही हूँ

बस भाग ही रही हूँ,

तुम्हारा साथ ना दे पायी

इस का दुख ना करना,

मेरा गुस्सा भी

तुम पर नहीं खुद पर है,

कि शायद मैं ही हार गयी तुम्हें

इस जीवन की भाग दौड में

….

.

तुम खुश हो या नहीं

पता नहीं,

पर मैं यहाँ अभी भी

वहीं खडी हूँ,

जहाँ कभी नहीं

जाना चाहती थी,

मैं चुप सी ही ठीक हूँ

शायद हाँ, तुम्हारे कोप के इंतज़ार में,

और ये बेकार सा जीवन ही

मेरे जीने की वज़ह सा हो गया है….

कुछ आज़ाद ख्य़ालों में
बंदिशें ढूँढता है कोई,
अपने ’पारणों’ में
खुद को ढूँढता है कोई,
सब में जाना हुआ
बेनाम है कोई…
गुमनाम है कोई ॥

किसी के लिये राम
तो किसी के लिये
विराम है कोई,
प्रतिदिन अपना ढूँढ्ता
पूर्णविराम है कोई,
बेजुबान चित्रों से मापता
नये आयाम है कोई…
गुमनाम है कोई ॥

एक हँसते हुए चाँद
को जन्म देती
शाम है कोई,
हर रात ठहाकों में
आँसूओं को करता
नीलाम है कोई,
छोटी-छोटी खुशियों का
इक नायाब सा
गुलाम है कोई…
क्या सच में गुमनाम है ’ये’ कोई…???

तुम्हारी मुस्कुराहटों के,
तुम्हारी प्यारी बातों के,
उन साथ बिताये पलों के
रूप में मिली सौगातों के
बदले में,
काश तुम्हें कुछ दे पाता,
काश, एक कविता लिख पाता…।

यूँ तो जो महसूस किया
उसे कोरे कागज़ पर उकेरना
बहती नदी को मुठ्ठी में
बन्द करने जैसा होगा,
काश उन भावनाओं के नीर
का रंग तुम्हें दिखला पाता,
काश, एक कविता लिख पाता…।
कोई ना समझ पाया था
ना कभी समझेगा,
कैसे और क्या हैं हम
इक-दूजे के लिये,
काश उस अनकही अनजानी
समझ को कोई संज्ञा दे पाता,
काश, एक कविता लिख पाता…।
अरे पगली,
कोई कवि थोडे ही हूँ,
कि तुझ पर अनगिनत
काव्य न्यौछावर कर दूंगा,
पर तेरी हर मुस्कुराहट
तो मेरे लिये ’तुकान्त’ है,
काश उन पलों, रंगों, संज्ञाओं पर
मैं भी एक ’मधुशाला’ लिख पाता…
काश, एक कविता लिख पाता…।

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