Tag Archive: nadiya


तुम्हारी मुस्कुराहटों के,
तुम्हारी प्यारी बातों के,
उन साथ बिताये पलों के
रूप में मिली सौगातों के
बदले में,
काश तुम्हें कुछ दे पाता,
काश, एक कविता लिख पाता…।

यूँ तो जो महसूस किया
उसे कोरे कागज़ पर उकेरना
बहती नदी को मुठ्ठी में
बन्द करने जैसा होगा,
काश उन भावनाओं के नीर
का रंग तुम्हें दिखला पाता,
काश, एक कविता लिख पाता…।
कोई ना समझ पाया था
ना कभी समझेगा,
कैसे और क्या हैं हम
इक-दूजे के लिये,
काश उस अनकही अनजानी
समझ को कोई संज्ञा दे पाता,
काश, एक कविता लिख पाता…।
अरे पगली,
कोई कवि थोडे ही हूँ,
कि तुझ पर अनगिनत
काव्य न्यौछावर कर दूंगा,
पर तेरी हर मुस्कुराहट
तो मेरे लिये ’तुकान्त’ है,
काश उन पलों, रंगों, संज्ञाओं पर
मैं भी एक ’मधुशाला’ लिख पाता…
काश, एक कविता लिख पाता…।

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छोड आई वो देस अपने बाबुल का,
उन ऊँचे ठंडे गलियारों में,
लिये कुछ कंकड, कुछ बर्फ़ के टुकडे,
कुछ ठंडी हवाओं की सिसकीयां अपने दामन में,
कुछ ने उस चनार मॆं माना उसे अपनी मां,
तो कुछ के लिये वो जीने का सहारा हो गई,
कुछ ने उसे पिपासा दूर करने का साधन बनाया,
कुछ ने अवशेष डाल उसे स्वर्ग मार्ग कर दिया,
तो कुछ ने उसके तट पर संगम देखा,
कुछ ने उससे पाया विसर्ग,
सब को कुछ ना कुछ देने वाली वो मां,
कब रोती सिसकती रही किसी ने ना देखा,
इस विकास के तले कब दब गई किसी ने नहीं देखा,
जा के मिल जाना है उसे भी उस अंतहीन सागर में,
ये सोच कर सब सहती रही,
गहरे नीर में नहीं दिखे उसके आँसू,
ॐकार में खो गई हर वो सिसकी,
बोल ना पाई, ना जता पाई,
रोती रही, बहती रही,
बोझ ढोती रही, सहती रही,
घुटती रही ये सोच कर,
कोई तो समझेगा उस अकेली बिलखती मां क दर्द,
दर्द उस अश्कों के बहते ढेर का,
दर्द नदिया का…..

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