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जानें कहाँ गये वो दिन

जब लिखना ही अभिरुचि था

ज़रूरत भी और कला भी

 

वो वक़्त कुछ और था

जब कलम ही ज़ुबान थी

और कोरा काग़ज़

मेरा अव्याप्त संसार

टूटे बिखरे से जीवन में

तन्हाई को खुद में सिमट जाने से रोकता

वो बंद सा

खुद ही का शिष्टाचार

 

 

अभी खुश हूँ

आज़ाद हूँ

देखता हूँ चारों ओर

और सोचता हूँ

की कितनी बिखरी हुई है

ये व्यवस्थित सी दुनिया

जहाँ खुद को थोड़ा वक़्त दे पाना भी

एक उपलब्धि से कम नहीं और

उपलब्धियों के पीछे भागना ही

दिनचर्या में आम है…

खाली सा हूँ या बहुत भरा

सहमा हुआ हूँ या बहुत डरा

सब कुछ है और सब हैं

फिर भी अकेला सा हूँ मैं

खुद बिन

जाने कहाँ गये वो दिन…

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खुले आकाश में मिले और

उलझ कर रह गये,

उडाने वाले माँझे को कब

खुद चलाने लगे

पता ना लगा,

we

हम तुम...

बेरंग से कब आसमानी रंगों में रंगी

पतंगों में ढल गये

हम तुम…..

समय की बयार उडाती गई

और बहते गये,

और साथ उडते उडते

कब इस जग से और दूर

और ऊपर हो गये

पता ना लगा,

दो दिशाहीन अंजानों से

कब अपने से बन गये

हम तुम…

पर पतंगें ही तो थे,

कभी ना कभी

कटने बिछडने के लिये

ही तो उडे थे…

हवा ने रुख क्या बदला

धुंधले बादलों से नीचे आ गये,

उलझी डोर सुलझी,

और सुलझे हुए रिश्ते

कब उस बेज़ान सी डोर की तरह उलझ गये

पता ना लगा,

अनजान से अपने बने थे

अपनों से फ़िर अनजान बने…

इस मतलबी दुनिया को

बचाते समझाते कब

अनजान भी ना रहे

हम तुम…..

parted

parted

everyone writes on how a guy feels after two people get parted.

here I try to depict… how a girl really feels…

जाने अन्जाने शायद कुछ

कह ना पायी थी,

तुम भी तो

ना थे समझे,

और हर अनकहा शब्द

दर्द बन कर रह गया है

.

सिरहन सी दौड जाती है

जब पास से निकल जाते हो,
क्या कठोर ही थे

या मैं ना जानी थी,

और हर छिपाया आँसू

वहीं जम कर रह गया है

.

ना चाह कर भी सोचने

पर मज़बूर हुई थी,

कि हम साथ थे जब

तो क्या पैदा इक दूरी हुई थी,

और हम जहाँ हैं आज क्या

उसी का नतीजा हो कर रह गया है

.

दिन से सप्ताह

सप्ताह पक्ष हुए, और

पक्ष महीने हुए हैं

हमें नज़रें मिलाये,

बस दूर से ही

सुनती हूँ तुम्हें,

और यादों के काँच का हर टुकडा

खुद को सताने का ज़रिया हो गया है

.

मैं तुम्हारी तरह

अपनी मर्ज़ी से नहीं चलती,

हज़ारों तरह की उम्मीदों का

नन्हा सा बांध हूँ,

किस किस को थाम के चलूँ

इसी कश्मकश में,

सब कुछ पीछे

छूटता जाता है,

रिश्ते नहीं संभाल पा रही हूँ

बस भाग ही रही हूँ,

तुम्हारा साथ ना दे पायी

इस का दुख ना करना,

मेरा गुस्सा भी

तुम पर नहीं खुद पर है,

कि शायद मैं ही हार गयी तुम्हें

इस जीवन की भाग दौड में

….

.

तुम खुश हो या नहीं

पता नहीं,

पर मैं यहाँ अभी भी

वहीं खडी हूँ,

जहाँ कभी नहीं

जाना चाहती थी,

मैं चुप सी ही ठीक हूँ

शायद हाँ, तुम्हारे कोप के इंतज़ार में,

और ये बेकार सा जीवन ही

मेरे जीने की वज़ह सा हो गया है….

To know just how he suffered would be dear;

To know if any human eyes were near

To whom he could he could entrust his wavering gaze,

Until it settled firm on paradise.

To know if he was patient, part content,

Was dying as he thought, or different;

Was it a pleasant day to die,

And did the sunshine face his way?

What was his furthest mind, of home, or god,

Or what the distant say,

At news that he ceased human nature

On such a day?

And wishes, had he any?

Just his sigh, accented,

Had been legible to me.

And was he confident until

Ill fluttered out in everlasting well?

And if he spoke, what name was best,

What first,

What one broke off with

At the drowsiest?

Was he afraid, or tranquil?

Might he know

How conscious consciousness could grow,

Till love that was, and love too blest to be,

Meet- and the junction to be eternity?

Where is he gone……..

Where is that guy lost???

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इन बहती हवाओं में,
शायद किसी की यादों में,
खो जाता हूँ….

हो कर भी नहीं होता,
बन्द आँखों से भी नहीं सोता,
शायद उन अनदेखे से सपनों में,
कहीं खो जाता हूँ…..

झिलमिलाती चांदनी की छाया में,
रात की उस काली काया में,
उन टूटे तारों की बरसातों में,
कहीं खो जाता हूँ…..

एक शान्त से अट्ठाहास में,
एक प्यार की मिठास में,
उन शरारत भरी मुसकुराहटों में,
कहीं खो जाता हूँ…..

उन बेचैन रातों में,
उन अनकही सी मुलाकातों में,
उन संभाले हुए सूखे गुलाबों में,
कहीं खो जाता हूँ…..

कुछ नींद भरी आँखों में,
कभी बीते लम्हों के शाख़ों में,
उन बनकर भी ना बन पाये रिश्तों में,
कहीं खो जाता हूँ…..

बिना डर के कब सोया, याद नहीं,
उदास क्यों था, पता नहीं….
पर उन सच्चे लगने वाले झूठों में,
कहीं खो जाता हूँ…..

शायद इतना शांत मैं कभी नही था,
ना जाने देता था किसी की मुसकुराहट की ल़कीर,
किसी को रोता देख काँपती थी रूह,
पर कहीं खो गया वो ग़मों का फ़कीर,
इस क्रोध में शायद सब कुछ खो बैठा,
हाँ, बहुत कुछ खो के ही आया हूँ,
पर पाना चाहा था  अपने आप को,
ये सोच कर कि, भूल जायेंगे उन सिसकते मंजरों को,
पर उन भुला देने वाली राहों में ही,
कहीं खो जाता हूँ…..

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