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खुले आकाश में मिले और

उलझ कर रह गये,

उडाने वाले माँझे को कब

खुद चलाने लगे

पता ना लगा,

we

हम तुम...

बेरंग से कब आसमानी रंगों में रंगी

पतंगों में ढल गये

हम तुम…..

समय की बयार उडाती गई

और बहते गये,

और साथ उडते उडते

कब इस जग से और दूर

और ऊपर हो गये

पता ना लगा,

दो दिशाहीन अंजानों से

कब अपने से बन गये

हम तुम…

पर पतंगें ही तो थे,

कभी ना कभी

कटने बिछडने के लिये

ही तो उडे थे…

हवा ने रुख क्या बदला

धुंधले बादलों से नीचे आ गये,

उलझी डोर सुलझी,

और सुलझे हुए रिश्ते

कब उस बेज़ान सी डोर की तरह उलझ गये

पता ना लगा,

अनजान से अपने बने थे

अपनों से फ़िर अनजान बने…

इस मतलबी दुनिया को

बचाते समझाते कब

अनजान भी ना रहे

हम तुम…..

parted

parted

everyone writes on how a guy feels after two people get parted.

here I try to depict… how a girl really feels…

जाने अन्जाने शायद कुछ

कह ना पायी थी,

तुम भी तो

ना थे समझे,

और हर अनकहा शब्द

दर्द बन कर रह गया है

.

सिरहन सी दौड जाती है

जब पास से निकल जाते हो,
क्या कठोर ही थे

या मैं ना जानी थी,

और हर छिपाया आँसू

वहीं जम कर रह गया है

.

ना चाह कर भी सोचने

पर मज़बूर हुई थी,

कि हम साथ थे जब

तो क्या पैदा इक दूरी हुई थी,

और हम जहाँ हैं आज क्या

उसी का नतीजा हो कर रह गया है

.

दिन से सप्ताह

सप्ताह पक्ष हुए, और

पक्ष महीने हुए हैं

हमें नज़रें मिलाये,

बस दूर से ही

सुनती हूँ तुम्हें,

और यादों के काँच का हर टुकडा

खुद को सताने का ज़रिया हो गया है

.

मैं तुम्हारी तरह

अपनी मर्ज़ी से नहीं चलती,

हज़ारों तरह की उम्मीदों का

नन्हा सा बांध हूँ,

किस किस को थाम के चलूँ

इसी कश्मकश में,

सब कुछ पीछे

छूटता जाता है,

रिश्ते नहीं संभाल पा रही हूँ

बस भाग ही रही हूँ,

तुम्हारा साथ ना दे पायी

इस का दुख ना करना,

मेरा गुस्सा भी

तुम पर नहीं खुद पर है,

कि शायद मैं ही हार गयी तुम्हें

इस जीवन की भाग दौड में

….

.

तुम खुश हो या नहीं

पता नहीं,

पर मैं यहाँ अभी भी

वहीं खडी हूँ,

जहाँ कभी नहीं

जाना चाहती थी,

मैं चुप सी ही ठीक हूँ

शायद हाँ, तुम्हारे कोप के इंतज़ार में,

और ये बेकार सा जीवन ही

मेरे जीने की वज़ह सा हो गया है….

छोड आई वो देस अपने बाबुल का,
उन ऊँचे ठंडे गलियारों में,
लिये कुछ कंकड, कुछ बर्फ़ के टुकडे,
कुछ ठंडी हवाओं की सिसकीयां अपने दामन में,
कुछ ने उस चनार मॆं माना उसे अपनी मां,
तो कुछ के लिये वो जीने का सहारा हो गई,
कुछ ने उसे पिपासा दूर करने का साधन बनाया,
कुछ ने अवशेष डाल उसे स्वर्ग मार्ग कर दिया,
तो कुछ ने उसके तट पर संगम देखा,
कुछ ने उससे पाया विसर्ग,
सब को कुछ ना कुछ देने वाली वो मां,
कब रोती सिसकती रही किसी ने ना देखा,
इस विकास के तले कब दब गई किसी ने नहीं देखा,
जा के मिल जाना है उसे भी उस अंतहीन सागर में,
ये सोच कर सब सहती रही,
गहरे नीर में नहीं दिखे उसके आँसू,
ॐकार में खो गई हर वो सिसकी,
बोल ना पाई, ना जता पाई,
रोती रही, बहती रही,
बोझ ढोती रही, सहती रही,
घुटती रही ये सोच कर,
कोई तो समझेगा उस अकेली बिलखती मां क दर्द,
दर्द उस अश्कों के बहते ढेर का,
दर्द नदिया का…..

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