Category: NATURE POEMS


खुले आकाश में मिले और

उलझ कर रह गये,

उडाने वाले माँझे को कब

खुद चलाने लगे

पता ना लगा,

we

हम तुम...

बेरंग से कब आसमानी रंगों में रंगी

पतंगों में ढल गये

हम तुम…..

समय की बयार उडाती गई

और बहते गये,

और साथ उडते उडते

कब इस जग से और दूर

और ऊपर हो गये

पता ना लगा,

दो दिशाहीन अंजानों से

कब अपने से बन गये

हम तुम…

पर पतंगें ही तो थे,

कभी ना कभी

कटने बिछडने के लिये

ही तो उडे थे…

हवा ने रुख क्या बदला

धुंधले बादलों से नीचे आ गये,

उलझी डोर सुलझी,

और सुलझे हुए रिश्ते

कब उस बेज़ान सी डोर की तरह उलझ गये

पता ना लगा,

अनजान से अपने बने थे

अपनों से फ़िर अनजान बने…

इस मतलबी दुनिया को

बचाते समझाते कब

अनजान भी ना रहे

हम तुम…..

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cloud alone

छोटी छोटी खुशियों समान बूंदों को

खुद में समेट कर,

सूखी मुरझाई धरती के

सुखे कंठ को देखकर,

ठिठुरती, रंभाती, हुंकारती

हवा को साथ लेकर,

मैं चला, मैं चला

उन झनझनाती बारिशों की बारात लेकर॥

.

कहीं कोप ने मेरे

सब कुछ बहा दिया,

तो कभी लाड मेरा देखकर

तुमने दुआ में हाथ उठा लिया,

हज़ारों नफ़रतों के बाग में

किसी एक मुसकुराहट का गुलाब लेकर

मैं चला, मैं चला

पास आये हर पिपासु की प्यास लेकर॥

.

अरे!! एक अदना सा

बादल ही तो था,

अपने आँसूओं से

सब को हँसाता गया,

अपने हर साथी को तूफानी

हवाओं में खोते देखा

फिर भी हर बार, हर समय

बढता गया, मुसकुराता गया,

इस प्रपंच के अगणित रिश्तों मे उलझा

किसी को दुलारता, तो किसी को दुत्कारता गया,

थक हार कर जब पँहुचा मरु

तो आँसू भी ना थे मेरे पास,

और तुमने आसानी से कह डाला

कि कहीं का न छोडा हमने…

बारिश ना देता, परंतु उस धूप से

हमेशा करता रक्षा तुम्हारी,

पर सब्र ना आया तुम्हें

और हर बार की तुम्हारे कोप मे

लो फिर से वाष्प हो गया मैं…

.

पर मरा नहीं हूँ मैं

फिर से आऊँगा,

तुम तो मेरे आँसूओं के भी लायक नहीं

औरों को अनगिनत खुशियों से नहलाऊँगा,

तुम्हारी ऊष्मा से बिखरे

मेरे मन को साथ लेकर,

मैं चला, मैं चला

किसी नई दुनिया में खुशियों की सौगात लेकर…॥॥

In the garden

A bird came down the walk,

He did not know I know;

He bit an angle worm in halves

And ate the fellow in raw.

 

And then he drank a dew

From a nearby grass,

And then hopped sidewise to the wall

To let a beetle pass,

 

He glanced with rapid eyes

That hurried all abroad,

They looked like rolling beads, I thought,

He then stirred his velvet head.

 

Like one in danger, cautious

I offered him a crumb,

And he unrolled his feathers

And rowed him home…

It was a bright and cheerful afternoon

Towards the end of the sunny month June,

The not wind congregates in crowd

The dust storms yelled in loud.

All things rejoiced beneath the sun, the weeds,

The rivers, the cornfields, the reeds,

The leaves glanced in the light breeze,

And foliage of larger trees.

It was winter when-

Birds die, fishes lie stiffned in translucent ice which makes,

From the mud and slime of warm lakes,

A wrinkled clod, as hard as brick-

And when,

Among children, the comfortable men,

Gather around fires and still feel cold,

Then what happens to the homeless beggars old.

Will you forget the happy hours,

Which we buried in love’s sweet bowers,

Heaping over their corpses cold

Blossoms and leaves instead of mould.

Flowers which were the joys slain

And the leaves, the hopes that yet remain,

Forgot the dead, the past? O yet,

Their ghosts will revenge for it.

Memories that make a heart tomb,

Regrets which slide through your spirit’s gloom,

And the whispers inside you tell,

That joy once lost, is pain. . .

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