Category: A POETRY BLOG


खुले आकाश में मिले और

उलझ कर रह गये,

उडाने वाले माँझे को कब

खुद चलाने लगे

पता ना लगा,

we

हम तुम...

बेरंग से कब आसमानी रंगों में रंगी

पतंगों में ढल गये

हम तुम…..

समय की बयार उडाती गई

और बहते गये,

और साथ उडते उडते

कब इस जग से और दूर

और ऊपर हो गये

पता ना लगा,

दो दिशाहीन अंजानों से

कब अपने से बन गये

हम तुम…

पर पतंगें ही तो थे,

कभी ना कभी

कटने बिछडने के लिये

ही तो उडे थे…

हवा ने रुख क्या बदला

धुंधले बादलों से नीचे आ गये,

उलझी डोर सुलझी,

और सुलझे हुए रिश्ते

कब उस बेज़ान सी डोर की तरह उलझ गये

पता ना लगा,

अनजान से अपने बने थे

अपनों से फ़िर अनजान बने…

इस मतलबी दुनिया को

बचाते समझाते कब

अनजान भी ना रहे

हम तुम…..

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कुछ आज़ाद ख्य़ालों में
बंदिशें ढूँढता है कोई,
अपने ’पारणों’ में
खुद को ढूँढता है कोई,
सब में जाना हुआ
बेनाम है कोई…
गुमनाम है कोई ॥

किसी के लिये राम
तो किसी के लिये
विराम है कोई,
प्रतिदिन अपना ढूँढ्ता
पूर्णविराम है कोई,
बेजुबान चित्रों से मापता
नये आयाम है कोई…
गुमनाम है कोई ॥

एक हँसते हुए चाँद
को जन्म देती
शाम है कोई,
हर रात ठहाकों में
आँसूओं को करता
नीलाम है कोई,
छोटी-छोटी खुशियों का
इक नायाब सा
गुलाम है कोई…
क्या सच में गुमनाम है ’ये’ कोई…???

तुम्हारी मुस्कुराहटों के,
तुम्हारी प्यारी बातों के,
उन साथ बिताये पलों के
रूप में मिली सौगातों के
बदले में,
काश तुम्हें कुछ दे पाता,
काश, एक कविता लिख पाता…।

यूँ तो जो महसूस किया
उसे कोरे कागज़ पर उकेरना
बहती नदी को मुठ्ठी में
बन्द करने जैसा होगा,
काश उन भावनाओं के नीर
का रंग तुम्हें दिखला पाता,
काश, एक कविता लिख पाता…।
कोई ना समझ पाया था
ना कभी समझेगा,
कैसे और क्या हैं हम
इक-दूजे के लिये,
काश उस अनकही अनजानी
समझ को कोई संज्ञा दे पाता,
काश, एक कविता लिख पाता…।
अरे पगली,
कोई कवि थोडे ही हूँ,
कि तुझ पर अनगिनत
काव्य न्यौछावर कर दूंगा,
पर तेरी हर मुस्कुराहट
तो मेरे लिये ’तुकान्त’ है,
काश उन पलों, रंगों, संज्ञाओं पर
मैं भी एक ’मधुशाला’ लिख पाता…
काश, एक कविता लिख पाता…।

बीते पलों में खोया जा रहा हूँ,
सूखे आँसूओं में डूबा जा रहा हूँ,
दिल ही दिल कोसता हूँ किसी को
धुंधली रातों में सोया जा रहा हूँ।
ना ना… डरो मत…
किसी देवदास से नहीं मिले तुम,
हैँ और भी लोग दुखी यहाँ
मैं तो बस एक छोटी सी
चुभन से उठे दर्दों के
एकाकीकृत बीज को
अपने से दूर कहीं
बोया जा रहा हूँ।

ठीक वैसी ही रात है,
वैसा ही अंधियारा…
फ़र्क सिर्फ़ इतना कि
इस बार सुबह का इन्त्ज़ार है
और आँखों मे उन्हीं
टूटे दर्पण के टुकडों की चमक,
शायद एक उम्मीद है
कि नयी सुबह का पंछी
एक नया पैगाम लायेगा।

फिर से…
चुप हूँ, खामोश हूँ, बेज़ुबान हूँ
पर मेरा विश्वास
मेरे ही अविश्वास से
जीत गया है,
और अपनी नियति को
ठुकराते ठुकराते जाने…
कितना अरसा बीत गया है… ॥

May be…

May be it was a tear

May be a smile behind it

Or just a wrong perception

Done by your conception…tired thinking

.

Was it the haze all around you…

Which blurred you that day

Or

Gloom of your mind

Which led you all the way..?

It was just radiance

Which I befriended long ago…

I know…

May be… I was not in mood

To cry that night.

.

You said I lost

What I got

Or

Someone took it from me

To fulfill their own ends.

May be… I never got that

Or

May be you never

Bestowed it for me…

Hey… did I know

‘WHAT’ it was…?

May be no…

May be yes…

.

This calligraphic note…

Isn’t for I miss you

May be… I am angry now

Spending this time

Drawing a line

Between desperation

And determination

Or

May be… yes…

I miss you.

.

I know you aren’t

Always happy

And do not think

My smile shows you

What it always tries

May be… it just tells

You are as stubborn

As I used to be.

And may be… I am still smiling. 🙂

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