Category: HINDI POEMS


आज लिखने बैठा हूँfountain-pen-writing
अरसे बीते हैं
अब जब कलम
कोसों दूर है

सालों से जिन्होने
शब्दों की रोशनी नहीं देखी
अब उन पुरानी बातों पर से
दिमागी परतें
आज उतारने बैठा हूँ

कहते फ़िरते हैं
शौक पाला है हमने
लिखने का
आज खुद ही खुद को खुद से
खुदा से और इस खुदी से
उपर उठाने बैठा हूँ

इक अधजला कागज़ हूँ
या इक सूखी दवात
इक टूटी कलम
या खोया हुआ खलायात
तुम्हारे सवालों में उलझा हुआ
इक जवाब
या बेचैन नींदों में खोया हुआ
इक अनजाना ख्वाब…
आज मैं हर इल्ज़ाम
मिटाने बैठा हूँ

जानें कहाँ गये वो दिन

जब लिखना ही अभिरुचि था

ज़रूरत भी और कला भी

 

वो वक़्त कुछ और था

जब कलम ही ज़ुबान थी

और कोरा काग़ज़

मेरा अव्याप्त संसार

टूटे बिखरे से जीवन में

तन्हाई को खुद में सिमट जाने से रोकता

वो बंद सा

खुद ही का शिष्टाचार

 

 

अभी खुश हूँ

आज़ाद हूँ

देखता हूँ चारों ओर

और सोचता हूँ

की कितनी बिखरी हुई है

ये व्यवस्थित सी दुनिया

जहाँ खुद को थोड़ा वक़्त दे पाना भी

एक उपलब्धि से कम नहीं और

उपलब्धियों के पीछे भागना ही

दिनचर्या में आम है…

खाली सा हूँ या बहुत भरा

सहमा हुआ हूँ या बहुत डरा

सब कुछ है और सब हैं

फिर भी अकेला सा हूँ मैं

खुद बिन

जाने कहाँ गये वो दिन…

खुले आकाश में मिले और

उलझ कर रह गये,

उडाने वाले माँझे को कब

खुद चलाने लगे

पता ना लगा,

we

हम तुम...

बेरंग से कब आसमानी रंगों में रंगी

पतंगों में ढल गये

हम तुम…..

समय की बयार उडाती गई

और बहते गये,

और साथ उडते उडते

कब इस जग से और दूर

और ऊपर हो गये

पता ना लगा,

दो दिशाहीन अंजानों से

कब अपने से बन गये

हम तुम…

पर पतंगें ही तो थे,

कभी ना कभी

कटने बिछडने के लिये

ही तो उडे थे…

हवा ने रुख क्या बदला

धुंधले बादलों से नीचे आ गये,

उलझी डोर सुलझी,

और सुलझे हुए रिश्ते

कब उस बेज़ान सी डोर की तरह उलझ गये

पता ना लगा,

अनजान से अपने बने थे

अपनों से फ़िर अनजान बने…

इस मतलबी दुनिया को

बचाते समझाते कब

अनजान भी ना रहे

हम तुम…..

एक सीने में दो दिल धडकते

मैंने देखा है,

एक को रोते

एक को औरों को हँसाते

मैंने देखा है,

खुद को अंजानों की भीड में

और भीड जैसा माहौल

खुद में उमडते

मैंने देखा है..॥

 

दूसरों की पादुकाओं में

ठंडी रातों में

अपने मन को

कुलमुलाते मैंने देखा है,

दीवार जैसे रिश्तों को

समय की आँधी में

फिसलती रेत होते

मैंने देखा है…॥

 

happy hand

happy me 🙂

 

देखो ना इतने ध्यान से तुम,

नज़रें जो मिली तो रो पडोगे,

सौ दर्द, हज़ार आँसू, अनगिनत लफ़्ज़ दबे हैं यहाँ,

दिल के टुकडे ’गर’ गिनने निकलोगे

तो खुद बिखर पडोगे,

शब्दों में बयां ना हो जो,

उस दास्तां का सारांश है ये,

जहाँ लोग ज़मानों की तरह

बदल गये,

और बदले ज़मानों का

हिसाब नहीं जहाँ,

हर टूटी मुस्कुराहट में

छिपी खुशी है जहाँ,

और उन्हीं लोगों, ज़मानों और मुस्कुराहटों मे

बर्फ़ से ठंडे रिश्तों को

खून मे बदलते

मैंने देखा है…

मैंने देखा है…॥॥

parted

parted

everyone writes on how a guy feels after two people get parted.

here I try to depict… how a girl really feels…

जाने अन्जाने शायद कुछ

कह ना पायी थी,

तुम भी तो

ना थे समझे,

और हर अनकहा शब्द

दर्द बन कर रह गया है

.

सिरहन सी दौड जाती है

जब पास से निकल जाते हो,
क्या कठोर ही थे

या मैं ना जानी थी,

और हर छिपाया आँसू

वहीं जम कर रह गया है

.

ना चाह कर भी सोचने

पर मज़बूर हुई थी,

कि हम साथ थे जब

तो क्या पैदा इक दूरी हुई थी,

और हम जहाँ हैं आज क्या

उसी का नतीजा हो कर रह गया है

.

दिन से सप्ताह

सप्ताह पक्ष हुए, और

पक्ष महीने हुए हैं

हमें नज़रें मिलाये,

बस दूर से ही

सुनती हूँ तुम्हें,

और यादों के काँच का हर टुकडा

खुद को सताने का ज़रिया हो गया है

.

मैं तुम्हारी तरह

अपनी मर्ज़ी से नहीं चलती,

हज़ारों तरह की उम्मीदों का

नन्हा सा बांध हूँ,

किस किस को थाम के चलूँ

इसी कश्मकश में,

सब कुछ पीछे

छूटता जाता है,

रिश्ते नहीं संभाल पा रही हूँ

बस भाग ही रही हूँ,

तुम्हारा साथ ना दे पायी

इस का दुख ना करना,

मेरा गुस्सा भी

तुम पर नहीं खुद पर है,

कि शायद मैं ही हार गयी तुम्हें

इस जीवन की भाग दौड में

….

.

तुम खुश हो या नहीं

पता नहीं,

पर मैं यहाँ अभी भी

वहीं खडी हूँ,

जहाँ कभी नहीं

जाना चाहती थी,

मैं चुप सी ही ठीक हूँ

शायद हाँ, तुम्हारे कोप के इंतज़ार में,

और ये बेकार सा जीवन ही

मेरे जीने की वज़ह सा हो गया है….

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