खुले आकाश में मिले और

उलझ कर रह गये,

उडाने वाले माँझे को कब

खुद चलाने लगे

पता ना लगा,

we

हम तुम...

बेरंग से कब आसमानी रंगों में रंगी

पतंगों में ढल गये

हम तुम…..

समय की बयार उडाती गई

और बहते गये,

और साथ उडते उडते

कब इस जग से और दूर

और ऊपर हो गये

पता ना लगा,

दो दिशाहीन अंजानों से

कब अपने से बन गये

हम तुम…

पर पतंगें ही तो थे,

कभी ना कभी

कटने बिछडने के लिये

ही तो उडे थे…

हवा ने रुख क्या बदला

धुंधले बादलों से नीचे आ गये,

उलझी डोर सुलझी,

और सुलझे हुए रिश्ते

कब उस बेज़ान सी डोर की तरह उलझ गये

पता ना लगा,

अनजान से अपने बने थे

अपनों से फ़िर अनजान बने…

इस मतलबी दुनिया को

बचाते समझाते कब

अनजान भी ना रहे

हम तुम…..