कुछ आज़ाद ख्य़ालों में
बंदिशें ढूँढता है कोई,
अपने ’पारणों’ में
खुद को ढूँढता है कोई,
सब में जाना हुआ
बेनाम है कोई…
गुमनाम है कोई ॥

किसी के लिये राम
तो किसी के लिये
विराम है कोई,
प्रतिदिन अपना ढूँढ्ता
पूर्णविराम है कोई,
बेजुबान चित्रों से मापता
नये आयाम है कोई…
गुमनाम है कोई ॥

एक हँसते हुए चाँद
को जन्म देती
शाम है कोई,
हर रात ठहाकों में
आँसूओं को करता
नीलाम है कोई,
छोटी-छोटी खुशियों का
इक नायाब सा
गुलाम है कोई…
क्या सच में गुमनाम है ’ये’ कोई…???