मैं हर बार हाथ बढाता हूँ

तुम हर बार मुझे झटक देती हो,

तुम्हें कैद नहीं करना चाहता

बस…. तुम्हें ओझल होते नहीं देख सकता।।

 

 

तुम तो इस जलसाग्र में तैरती

एक उन्मुक्त जलपरी की तरह हो,

मुझे किसी जाल की तरह मत समझो,

मैं तो इस संसार की जलविहीन ऊष्मा से

तुम्हें सहेज कर रखना चाहता हूँ,

पर तुम हो कि इस बहते जल मे

रुकना ही नहीं चाहतीं और मैं

बस…. तुम्हें धुंधलाते हुए देखता हूँ॥

 

तुम समुंदर का किनारा हो

मैं प्यासी लहर की तरह,

तुम्हें चूमने के लिये उठता हूँ

तुम तो चट्टान की तरह

वैसी ही खडी रहती हो,

और मैं हर बार तुम्हें

बस…. छू के लौट जाता हूँ॥