रात की दस्तक दरवाज़े पर है
आज का दिन भी बीत गया है
कितना था उजाला फिर भी फिर से
अन्धियारा ही जीत गया है
एकान्त की चादर ओढ़ कर फिर से
मैं खुद में खोया जाता हूँ
आँखों के सामने यादों के रथ पर
मेरा ही अतीत गया है
सन्नाटों के गुन्जन में दबकर
अपनी ही आवाज़ नहीं आती मुझको
आँखों की सरहद पर लड़ता
आँसू भी अब जीत गया है
टूटे दर्पण के सामने बैठकर
मैं स्वयं को खोज रहा हूँ
प्यार है, जीना मुझे भी है,
पर अब इंतजार करता करता ये दिल थक गया है,
वो समझें मुझे, बिना कहे ये बोल,
इस उम्मीद में ये लम्हे काट रहा हूँ
बस उन्हें ना कहते कहते
ये मन भी थक गया है,
………
चुप हूँ, खामोश हूँ, बेज़ुबान हूँ
अलग से बैठा हूँ एक झूठी हँसी के साथ, और
यूँ ही बैठे बैठे जाने
कितना अरसा बीत गया है … ॥