इन बहती हवाओं में,
शायद किसी की यादों में,
खो जाता हूँ….

हो कर भी नहीं होता,
बन्द आँखों से भी नहीं सोता,
शायद उन अनदेखे से सपनों में,
कहीं खो जाता हूँ…..

झिलमिलाती चांदनी की छाया में,
रात की उस काली काया में,
उन टूटे तारों की बरसातों में,
कहीं खो जाता हूँ…..

एक शान्त से अट्ठाहास में,
एक प्यार की मिठास में,
उन शरारत भरी मुसकुराहटों में,
कहीं खो जाता हूँ…..

उन बेचैन रातों में,
उन अनकही सी मुलाकातों में,
उन संभाले हुए सूखे गुलाबों में,
कहीं खो जाता हूँ…..

कुछ नींद भरी आँखों में,
कभी बीते लम्हों के शाख़ों में,
उन बनकर भी ना बन पाये रिश्तों में,
कहीं खो जाता हूँ…..

बिना डर के कब सोया, याद नहीं,
उदास क्यों था, पता नहीं….
पर उन सच्चे लगने वाले झूठों में,
कहीं खो जाता हूँ…..

शायद इतना शांत मैं कभी नही था,
ना जाने देता था किसी की मुसकुराहट की ल़कीर,
किसी को रोता देख काँपती थी रूह,
पर कहीं खो गया वो ग़मों का फ़कीर,
इस क्रोध में शायद सब कुछ खो बैठा,
हाँ, बहुत कुछ खो के ही आया हूँ,
पर पाना चाहा था  अपने आप को,
ये सोच कर कि, भूल जायेंगे उन सिसकते मंजरों को,
पर उन भुला देने वाली राहों में ही,
कहीं खो जाता हूँ…..